अभी कुछ दिन
पहले जब वित्तीय वर्ष 26-27 के पहली तिमाही जीडीपी आंकड़े के साथ रियल जीडीपी 7.8 फीसदी
की घोषणा सरकार के द्वारा की गई तो इसके आलोचना में पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग
के बयान ने इसे काफी विवादित बना दिया। मैंने इसी विवाद के पार्श्व में क्या सच्चाई
है इसे समझने और समझाने दोनों की कोशिश की है. मैंने जीडीपी घोषणा के दिन सुभाष चंद्र
गर्ग क्या कह गए और विवाद के बाद दिए अपने एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में उन्होंने क्या
कहा उसको भी सुना। दरअसल जीडीपी घोषणा वाले दिन टीवी पर सुभास चंद्र गर्ग ने सरकार
की मंशा पर सवाल उठा इस बात पर क्लेम किया की सरकार ने चूँकि इस तिमाही का जीडीपी ग्रोथ
ज्यादा दिखाना था इसलिए पिछले वर्ष की पहली तिमाही का जीडीपी का डाटा 86.05 लाख करोड़
से घटाकर 80 लाख करोड़ कर दिया ताकि इस वित्त वर्ष के ₹88.27 लाख करोड़ से इसकी तुलना
करें तो ग्रोथ ज्यादा दिखे। ऐसा कह के उन्होंने सरकार की मंशा पर ही सवाल खड़ा कर 7.8
के ग्रोथ को गलत बताते हुए नॉमिनल जीडीपी के ग्रोथ को १०.३ फीसदी की जगह 2.6 बताया।
हालांकि पहली तिमाही वित्तीय वर्ष 2026-27 की रियल जीडीपी ₹81.36 लाख करोड़ और पहली तिमाही वित्तीय
वर्ष 2025-26 की तुलनीय रियल जीडीपी
₹75.46 लाख करोड़ है। इससे रियल जीडीपी ग्रोथ
7.8 प्रतिशत निकलती है। हालाँकि इसके बाद दिए गए पॉडकास्ट इंटरव्यू में वे मंशा वाले
सवाल से हट कर आंकड़ों की पारदर्शिता की बात करते दिखाई दिए और इस बात पर जोर दिया की
नॉमिनल जीडीपी का आंकड़ा 86.05 लाख से कैसे 80 लाख करोड़ पहुंचा इसको सरकार को बताना
चाहिए।
श्री गर्ग के
बयान के बाद मीडिया ने भी गलत तरीके से इसे पेश किया की जीडीपी ग्रोथ 7.8 फीसदी नहीं
2.6 फीसदी है, जबकि उस दिन श्री गर्ग 2.6 फीसदी नॉमिनल जीडीपी आंकड़े के लिए कह रहे
थे रियल जीडीपी के आंकड़े तो उनके हिसाब से शून्य आ रहे थे. चूँकि श्री गर्ग वित्त सचिव
थे तो मीडिया विपक्ष सबने इनके बयान को गंभीरता से लिया और देश में जीडीपी के आंकड़े
को लेकर भ्रम पैदा हो गया. मैंने अपने अध्ययन में पाया पहले दिन टीवी में बोलते वक़्त
श्री गर्ग ने फंडामेंटली गलती कर गये. जब भी जीडीपी की नई सीरीज आती है उसकी विधि,
उसके डाटा सोर्स, उसके डाटा बास्केट सब उन्नत हो जाते हैं. इसलिए दो अलग अलग बेस वर्ष
के सीरीज के जीडीपी डाटा एक दूसरे के लिए तुलनीय नहीं होते। और अगर तुलनीय बनाना ही
है तो या तो दो वर्ष के जीडीपी डाटा को किसी एक सीरीज के हिसाब से समायोजित करना पड़ेगा।
ऐसे में या तो आप वर्ष 26-27 के आंकड़े को जो आपने नई बेस सीरीज 22-23 के हिसाब से निकालिये
और फिर पुराने 11-12 सीरीज के हिसाब से निकाले गए डाटा 86.05 लाख करोड़ से तुलना करिए
या आप 26-27 के डाटा को 22-23 के नए सीरीज के विधि, बास्केट और डाटा सोर्स के हिसाब
से ही रहना दीजिये और पुराने सीरीज से निकाले गए वित्तीय वर्ष 25-26 के डेटा को नई
बेस सीरीज के विधि, डाटा सोर्स और डाटा बास्केट के हिसाब से समायोजित कर नए डाटा से
तुलना योग्य डाटा निकालिये। और सरकार ने यही किया पहली तिमाही वर्ष 25-26 के डाटा को
तुलनीय बनाने के लिए नई बेस सीरीज के गणना विधि, डाटा सोर्स और डाटा बास्केट के हिसाब
से समायोजित कर 80 लाख करोड़ का डाटा निकाला और फिर तुलना किया।
इसे मैं एक
व्यावहारिक आंकड़े से समझाता हूँ. कुछ वर्ष पूर्व भारत में बड़ी कंपनियों के लिए नए एकाउंटिंग
मानक लागू हुए. जब ये लागू हुए तो वर्तमान
वर्ष के लाभ हानि और बैलेंस शीट तो इस नए एकाउंटिंग मानक के हिसाब से बन गए और ऑडिट
हो गए. चूँकि कंपनियों को अपने बैलेंस शीट में वर्तमान वर्ष और पिछले वर्ष दो वर्ष
का डाटा दिखाना होता है तो वहां दिक्कत आ रही थी क्यूंकि वर्तमान वर्ष का लाभ हानि
और बैलेंस शीट नए लेखा मानक पर था और पिछले वर्ष का पूरा आंकड़ा पुराने लेखा मानक के
हिसाब से था. इसलिए दोनों की तुलना बैलेंस शीट रीडर के लिए गलत हो जाता। ऐसे में यह
रास्ता निकाला गया की पिछले वर्ष के ऑडिटेड डाटा को भी नए लेखा मानक के हिसाब से ट्रांसलेट
कर के ही बैलेंस शीट में दिखाए जाएँ ना कि को पुराने आंकड़े को जस का तस. और ऐसा कर
के कंपनियों ने अपने पिछले वर्ष के आकड़े को वर्तमान वर्ष के आकंड़े से तुलनीय बनाया।
ऐसे में यह बहुत सामान्य है की अगर दो वर्षों के डाटा में विधि, मानक, डाटा सोर्स या
डाटा बास्केट बदला हुआ है तो दोनों में से किसी एक को तो समायोजित कर दोनों डाटा को
एक मानक एक तराजू पर तो लाना ही पड़ेगा तभी तुलना हो सकती है.
अतः अगर संशोधित
या समायोजित डाटा से तुलना हुआ है तो इसमें कोई गलती नहीं हुई है यह उन्नत डाटा की
प्रक्रिया में एक सामान्य घटना है. इसलिए मेरा मानना है की अपने पहले टीवी बाइट में
श्री गर्ग का तर्क सही नहीं था शायद इसीलिए उन्होंने अपने दूसरे पॉडकास्ट में पारदर्शिता
पर जोर दिया की सरकार 86.05 लाख करोड़ का डाटा 80 लाख करोड़ कैसे हुआ उसे बताये। उनका
अगले पॉडकास्ट में उनके द्वारा उठाया गया विषय तार्किक है की अगर इतना बड़ा बदलाव हुआ
तो पारदर्शिता बनती है और जनता को बदलाव के बिंदुओं को बताया जाना चाहिए।
जीडीपी दरअसल
कोई ऐसा आंकड़ा नहीं है जिसे किसी एक मशीन से नाप लिया गया हो या देश के हर लेन-देन
की रसीद जोड़कर निकाल लिया गया हो। यह राष्ट्रीय लेखांकन की निर्धारित पद्धति के अनुसार
अलग-अलग क्षेत्रों से प्राप्त आंकड़ों, सर्वेक्षणों, प्रशासनिक स्रोतों, उत्पादन संकेतकों
और अन्य सांख्यिकीय सूचनाओं के आधार पर तैयार किया जाने वाला अनुमान है। इसलिए जीडीपी
का आंकड़ा अनुमानित जरूर है, लेकिन मनमाना नहीं। और यही कारण है कि जीडीपी के आंकड़े
समय के साथ संशोधित होते हैं। जीडीपी में संशोधन
होना सामान्य प्रक्रिया है. जीडीपी का पहला अनुमान उस समय उपलब्ध सीमित जानकारी के
आधार पर तैयार होता है। समय बीतने के साथ अधिक विस्तृत और बेहतर आंकड़े उपलब्ध होते
हैं। कंपनियों के वास्तविक परिणाम, सरकारी खातों की अधिक विस्तृत जानकारी, कृषि उत्पादन,
औद्योगिक उत्पादन, सर्वेक्षण और दूसरे प्रशासनिक आंकड़े बाद में उपलब्ध हो सकते हैं।
भारत में यह
कोई नई परंपरा नहीं है। जीडीपी के लिए एडवांस अनुमानों, प्रोविजनल अनुमानों और संशोधित
अनुमानों की व्यवस्थित प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है। पहले पहला एडवांस अनुमान,
दूसरा एडवांस अनुमान, प्रोविजनल अनुमान और उसके बाद पहला, दूसरा तथा तीसरा संशोधित अनुमानों के चरण थे। लेकिन 2024 में दूसरे
संशोधित अनुमान को अंतिम अनुमान मानते हुए तीसरे संशोधित अनुमान की पुरानी व्यवस्था
समाप्त करने का निर्णय लिया। इसलिए वर्तमान व्यवस्था में सामान्यतः पांच प्रमुख चरण
रह गए हैं। इसलिए जीडीपी का संशोधन होना अपने आप में न असामान्य है और न ही किसी गड़बड़ी
का प्रमाण।
मेरा मानना
है कि संशोधन होना सामान्य है तो संशोधन के कारणों की पारदर्शी व्याख्या भी उतनी ही
सामान्य और जरूरी होनी चाहिए और वो भी तब जब अंतर ६ लाख करोड़ जैसे बड़े आंकड़े के आसपास
हो। चूँकि यह अंतर् बड़ा है और एक पुराने जीडीपी अनुमान के बाद में हुए पुनर्गणना और
आगे के संशोधन का परिणाम है। लेकिन इतना बड़ा संशोधन निश्चित रूप से पारदर्शिता मांगता
है। और हां यह कहना कि “बेस ईयर बदल गया, इसलिए ₹86.05 लाख करोड़ घटकर ₹80 लाख करोड़
हो गया” अधूरा स्पष्टीकरण होगा।। नई 2022-23 जीडीपी
सीरीज में पुराने अनुमानों को अद्यतन डाटा सोर्स, उन्नत मेथोडोलॉजी, संशोधित कवरेज
और अन्य उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर पुनर्गणित किया गया। इसके बाद उपलब्ध हुए नए आईआईपी
और पीपीआई सूचकांक को भी जीडीपी संकलन में शामिल किया गया। नई जीडीपी सीरीज, बेहतर
और अद्यतन डाटा सोर्स, कवरेज तथा उन्नत मेथोडोलॉजी में सुधार और बाद में उपलब्ध नए
संकेतकों के आधार पर पुराने जीडीपी अनुमानों को दुबारा गणना किया गया, जिसके कारण पुराने वर्तमान मूल्य अनुमानों
में भी बदलाव आया।
आमजन के मन
में साधारण सा सवाल होगा की वर्तमान मूल्य जीडीपी तो उस समय की कीमतों पर होती है,
फिर वह बदल कैसे गई? यही सबसे स्वाभाविक सवाल है। यदि पहली तिमाही वित्तीय वर्ष
2025-26 में वस्तुओं और सेवाओं की बाजार कीमतें वही थीं, तो आज उनके वर्तमान मूल्य
में बदलाव कैसे आ सकता है? इसका कारण यह है कि वर्तमान मूल्य जीडीपी भी देश की प्रत्येक
आर्थिक गतिविधि का सीधे-सीधे वास्तविक समय में जोड़ा गया अंतिम बिल नहीं है। यह भी
राष्ट्रीय लेखांकन की विभिन्न अनुमान विधि और डाटा सोर्स से तैयार किया गया अनुमान
है। यदि किसी सेक्टर का कवरेज बदलता है, सोर्स डाटा बेहतर होता है, क्लासीफिकेशन बदलता
है, अनुमान विधि सुधरता है या किसी कम्पोनेंट के लिए पहले की तुलना में बेहतर जानकारी
उपलब्ध होती है, तो उसी पुराने समय के वर्तमान मूल्य अनुमान को भी संशोधित किया जा
सकता है। इसलिए ₹86.05 लाख करोड़ का पुराना आंकड़ा और ₹80.00 लाख करोड़ का नया आंकड़ा
दोनों अपने-अपने समय में उपलब्ध जानकारी और लागू सांख्यिकीय फ्रेमवर्क पर आधारित अनुमान
हैं।
एक और महत्वपूर्ण
बात आज का ₹88.27 लाख करोड़ अंतिम आंकड़ा नहीं है, यह भी एक अनुमान है। आगे अधिक विस्तृत
डाटा उपलब्ध होने पर इसमें संशोधन हो सकता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि अभी जारी
7.8 प्रतिशत को इस्तेमाल ही न किया जाए। अर्थव्यवस्था के हर समय के निर्णय के लिए उस
समय उपलब्ध सर्वोत्तम आधिकारिक अनुमान का इस्तेमाल करना पड़ता है।
सही रास्ता
है एक ही जीडीपी सीरीज, एक ही विधि, एक ही प्राइस कांसेप्ट और एक ही तुलनीय आधार पर
तुलना। इस कसौटी पर पहली तिमाही वित्तीय वर्ष 2026-27 की रियल जीडीपी ग्रोथ 7.8 प्रतिशत ही वर्तमान आधिकारिक और
तुलनीय आंकड़ा है।
- पंकज जायसवाल

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