आज का युग ऊर्जा युग है यदि वैश्विक युद्ध, समुद्री मार्गों में तनाव, प्रतिबंध या भू-राजनीतिक संकट उत्पन्न होते हैं तो ऊर्जा संकट बड़ा हो जाता है. अभी हाल ही में पेट्रोल डीजल गैस और दूध के दाम बढे हैं. कई लोग इस वृद्धि को ही संकट मान रहें हैं जबकि असली संकट यह नहीं असली संकट तो पेट्रोल डीजल गैस की आपूर्ति का है.
जिस देश में पेट्रोल डीजल गैस अगर ८८ फीसदी से अधिक आयात पर निर्भर हो और वह आयात जिस गलियारे से आती हो और उस गलियारे पर डबल नाकाबंदी हो गई हो तो इतनी जल्दी आप कैसे वैकल्पिक मार्ग वैकल्पिक श्रोत और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता ढूंढ पाएंगे। और जो हम नए आपूर्तिकर्ता ढूढेंगे वह पूरी दुनिया में आ पड़ी इस आपूर्ति संकट के बीच नियमित मूल्य पर तो ये तीनों चीजें देंगे ऐसा शायद संभव ना हो। हमारे ८८ फीसदी आयात में से लगभग ४० से ४५ फीसदी ऊर्जा आयात इसी गलियारा से गुजरेगा। और अगर इस संकट का समाधान नहीं हो रहा है तो मतलब ४५ फीसदी हमारी आपूर्ति कम होने की संभावना है. चलिए हम बातचीत कर के हम कुछ टैंकर यहां से मंगवा भी लेते हैं और कुछ वैकल्पिक श्रोत से मंगवा लेते हैं तो भी यह गैप इतना बड़ा है की १ महीने में तो भरेगा नहीं कुछ महीने लग सकते हैं. और ऐसा लगता है कि इन कुछ महीनों में लाख जतन से भी हम २० से २५ फीसदी ही वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं, मतलब आपूर्ति में २० फीसदी की कमी कुछ महीनों तक रहने की संभावना बनती है. इससे मांग बढ़ने, आपूर्ति घटने से आयात महंगा हो सकता है जिससे डॉलर और मजबूत और रुपया और कमजोर हो सकता है और महंगाई फिर से और बढ़ सकती है ।
मतलब अगर कुछ महीनों तक पेट्रोल डीजल गैस की कमी २० फीसदी तक रहती है तो इन तीनों से चलने वाले सारे काम जैसे की ट्रासंपोर्ट, इंफ़्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, किचन सब इतने फीसदी से कम मतलब मंद हो सकते हैं। होर्मुज की नाकाबंदी सेवा एवं गुड्स के उत्पादन की गति को मंद कर सकती और जब मंद करेगी तो मंदी आएगी और जब मंदी आएगी तो महंगाई आएगी, महंगाई आएगी तो बैंक रेट बढ़ेगा, बैंक रेट बढ़ेगा तो ईएमआई बढ़ेगी, ईएमआई बढ़ेगी तो खरीद कम होगी, यह एक तरह से दुष्चक्र में फंसने जैसा हो जायेगा।
जब यह मंदी पूरी दुनिया के स्तर पर फैलेगी तो अमेरिका का फ़ेडरल बैंक भी रेट कट रोकेगा, रेट बढ़ा भी सकता है. इससे डॉलर असेट की वैल्यू बढ़ जायेगी और ऐसे में दुनिया भर के निवेशक अन्य निवेशों से पैसे निकाल कर डॉलर असेट में निवेश करने लग सकते हैं और इससे शेयर बाजार में उथल पुथल मचने की संभावना हमेशा बनती रहेगी।।
मतलब अगले कुछ महीने मेटा इकोनॉमिक्स इफ़ेक्ट के नियमों के तहत तरंग की तरह इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा और विश्वव्यापी मंदी का संकट आ सकता है । ऐसे में भारत सरकार और भारतीय सबको सज्ज रहना पड़ेगा इससे लड़ने के लिए. यह युद्ध और इस युद्ध से उपजी परिस्थितियां दोनों अपने वश में नहीं है. अपने पास है तो अपना संयम और अपनी नीतियां। सरकार और जनता को इन्ही दोनों पर काम करना पड़ेगा।
सरकार अपने संयम और नीतियों के व्यवहार में बदलाव करते हुए जहां संभव हो रहा है वहां वर्क फ्रॉम होम को प्रमोट कर रही है ताकि गाड़ियों पर ईंधन खर्च कम हो. दूसरा सरकार की चुनौती डॉलर और आयात बिल का भागता हुआ मूल्य है इसके लिए सरकार सोने की आयात पर ड्यूटी लगा रही है ताकि आभूषण के लिए ख़रीदे जा रहे सोने की मात्रा के लिए आयात कम हो. सोने की आयात कम कर सरकार आयात बिल कम करने की कोशिश में है. इन सबके अलावा पेट्रोलियम पदार्थों का निर्यात भी रोकना एक अच्छा कदम हो सकता है। सरकार अगले मौद्रिक समीक्षा में बैंक रेट भी बढ़ा सकती है क्यूंकि थोक और खुदरा दोनों महंगाई दर बढे हुए हैं, इस बैंक रेट को बढ़ा कर बाजार में मुद्रा की मात्रा कम कर सरकार महंगाई कम करने की कोशिश करेगी, लेकिन इस प्रयास में ईएमआई बढ़ जाएगी।
ऐसे में जनता के स्तर से भी इस युद्ध को लड़ना पड़ेगा। चूंकि २० फीसदी तक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है ऐसे में हम अपनी खपत को भी इसके आसपास कम कर लें तो इस झटके को हम सह लेंगे। और चूंकि भारत कृषि प्रचुर देश है तो इस खपत मैनेजमेंट और कृषि संमृद्धि के होने से हमें वैसे संकटों का सामना नहीं करना पड़ेगा जैसा अन्य देश करेंगे।
पहले बात करते हैं की गाड़ियों के ईंधन में १० से २० फीसदी कैसे कम कर सकते हैं. मैं टेम्पोरेरी सलाह की आप कुछ दिन कार पूलिंग करें या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से चलें जैसे सलाह नहीं दूंगा क्यूंकि ये कुछ ही दिनों के लिए और प्रतीकात्मक ही हो सकते हैं. टिकाऊ सलाह वह हैं जिन्हे आप वाकई में अपनी उत्पादकता में कमी किये बिना लागू कर सकते हैं और वह भी आसानी से. इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीद सकते हैं तो खरीदें नहीं तो निम्न व्यवहार परिवर्तन करें। जैसे वाहन में ईंधन की खपत कम करने के लिए सबसे पहले वाहन के टायर की हवा चेक करते रहें और हमेशा सही हवा रखें। गाड़ियों की मरम्मत अप टू डेट रखें और खटारा गाडी से न चलें। गाडी कभी बहुत तेज तो कभी बहुत धीमें ना चलाएं नियमित गति से उचित रेंज में गाडी चलाएं। गाडी के शीशे बंद कर के गाडी चलाएं ताकि उलटी हवा के दबाब से गाडी के इंजन पर दबाब ना पड़े. मीटिंग की संख्या कम करते हुए जो काम फोन से या व्हाट्सप्प कांफ्रेंस से या ऑनलाइन हो जाए उसे कुछ दिन ऐसे ही कर लें और बिना उत्पादकता कम किये हुए भौतिक मीटिंग को जितना संभव कम हो सकता है कम कर लें. सिग्नल पर गाडी को बंद कर दें. इन सब प्रैक्टिस चेंज से आप बिना किसी उत्पादकता को प्रभावित किये बिना सिर्फ चेंज प्रैक्टिस से ही ईंधन की खपत को १० से १५ फीसदी कम कर सकते हैं. आपका टारगेट होना चाहिए की अगर महीने में आप १०० लीटर ईंधन खरीदते हैं तो आप कैसे ८० लीटर में ही वो सारे काम चला लें. ऐसे में हम सिर्फ महीने में देश का डॉलर ही नहीं बचाएंगे हम २५ फीसदी तक ईंधन मूल्यवृद्धि के झटके तक भी अपने आपको तैयार रखेंगे।
अब आते हैं तेल के बाद गैस की खपत कैसे कम कर सकते हैं. गाड़ियों के गैस में तो उपरोक्त व्यवहार परिवर्तन कर खपत कम कर सकते हैं. घरेलू गैस की बचत के लिए भी हमें कुछ चेंज प्रैक्टिस करना पड़ेगा। पहला हम घर पर एक इंडक्शन चूल्हा और इलेक्ट्रिक केतली रख लें और अपने खाने पकाने में से जो भी आइटम हम इस पर बना सकते हैं वह इस पर ही बनायें। जैसे चावल दाल पानी गरम पानी ग्रीन टी इत्यादि। चाय एक दो समय के लिए कम कर सकते तो कम करें। आप इस मिक्स यूज को अपना कर गैस के यूज को २० से २५ फीसदी तक कम कर सकते हैं. फिर खाने को प्रेशर कुकर में बनायें, धीमे आंच में बनायें और बर्तन रखने के बाद चूल्हा जलायें और सही लाइटर रखें। इस चेंज प्रैक्टिस से आप १० से १५ फीसदी तक गैस खपत और कम कर सकते हैं. साथ में अगर दो तीन सब्जी बनती है घर में तो आप १ सब्जी पर आ जाएँ और सप्ताह में एक दिन अचार चटनी और चोखे का उपभोग करें। इन सब के इस्तेमाल से आप ५ से १० फीसदी फीसदी और गैस खपत कम कर सकते हैं. इस प्रकार आप करीब करीब ३० फीसदी गैस ईंधन ख़त्म कर सकते हैं. घरेलू और कमर्शियल किचन यूज में ये चेंज प्रैक्टिस को फॉलो करें तो अच्छा खासा गैस बचत हो सकती है। हर गैस उपभोक्ता को यह टारगेट करना चाहिए की इस चेंज प्रैक्टिस को अपना कर जो गैस ३० दिन में ख़त्म हो रही है उसे ४० दिन तक चलाएं। ऐसे में हम देश का डॉलर ही नहीं बचाएंगे हम ३० फीसदी तक मूल्यवृद्धि के झटके तक भी अपने आपको तैयार रखेंगे।
अब आते हैं खाद्य तेल की खपत कैसे कम कर सकते हैं, क्यूंकि आज भी हम पाम आयल सबसे अधिक इम्पोर्ट कर सकते हैं. इसके लिए सरकार तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहित कर सकती है. सबसे पहले हमें यदि हम महीने में अगर हम तीन लीटर तेल का इस्तेमाल करते हैं तो हमें कोशिश करनी चाहिए की हम २.५ लीटर में ही वही खाना बना लें थोड़ा तेल का कम प्रयोग करें। तली चीजों के इस्तेमाल में कुछ दिनों तक कमीं लाएं। सप्ताह में एक दिन अचार चटनी और चोखे का उपभोग करें। इस प्रकार हम अपने स्तर पर भी ऐसे में हम देश का डॉलर ही नहीं बचाएंगे तेल की खपत को कम कर के ३० फीसदी तक मूल्यवृद्धि के झटके तक भी अपने आपको तैयार रखेंगे।
सोने की खपत को भी हम नियंत्रित कर अपना डॉलर ऑउटफ्लो और आयात बिल कम रख सकते हैं. ऐसे में उतना ही सोना खरीदें जितना जरुरी है डिलीवरी वाला सोना अगर आभूषण वाला है तो उसे जरुरत के स्तर तक ही कुछ महीनों तक खरीदें, सोने में उस खरीद को बंद करने का प्रयास करें जिसे आप तिजोरी में रखने वाले हैं. निवेश सिर्फ उन्ही चीजों में करें जो मनी सर्कुलेशन बढ़ाने वाली हो.
और अगर इन उपभोग के चेंज प्रैक्टिस से हम लगभग २५ फीसदी तक के मूल्यवृद्धि को ही नहीं सहने योग्य होंगे बल्कि हम २५ फीसदी आपूर्ति की कमी से होने वाली मंदी से लड़ इसे रोकने में या इसका प्रभाव कम करने में काफी हद तक सफल होंगे।

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