जब से इज़राइल और अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की है, भारत की स्थिति अत्यंत दुविधापूर्ण हो गई है. यह दुविधा केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़ी हुई है. एक ओर इज़राइल भारत का महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ भारत के संबंध हजारों वर्षों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्कों पर आधारित हैं. ऐसे में किसी एक पक्ष के समर्थन का निर्णय भारत के लिए दूरगामी परिणाम ला सकता है।
इज़राइल पिछले कई वर्षों से भारत का विश्वसनीय रक्षा सहयोगी रहा है. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हो या सीमाई सुरक्षा के संवेदनशील मुद्दे, इज़राइल ने कई अवसरों पर भारत का साथ दिया है. भारत की रक्षा प्रणाली में इज़राइल से प्राप्त तकनीक और उपकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यही कारण है कि भारत के सुरक्षा दृष्टिकोण से इज़राइल को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार माना जाता है. यदि भारत खुलकर ईरान का समर्थन करता है, तो इस रक्षा सहयोग पर असर पड़ सकता है, जो भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
दूसरी ओर ईरान के साथ भारत के संबंध केवल आधुनिक राजनीति तक सीमित नहीं हैं. प्राचीन काल में भारतीय उपमहाद्वीप और पश्चिम एशिया के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क स्थापित थे. आधुनिक दौर में भी ईरान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहा है. भारत की तेल और गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र से आता है. इसके अतिरिक्त ईरान में चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुँच का वैकल्पिक मार्ग प्रदान करती है. इसलिए ईरान के साथ संबंधों में किसी भी प्रकार का तनाव भारत के आर्थिक और सामरिक हितों को प्रभावित कर सकता है.
इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. अमेरिका वैश्विक राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति है और उसके साथ भारत के संबंध पिछले वर्षों में मजबूत हुए हैं. ऐसे में भारत अमेरिका के साथ अनावश्यक तनाव पैदा नहीं करना चाहता। विशेष रूप से तब, जब वैश्विक राजनीतिक वातावरण पहले से ही अस्थिर है. अमेरिका के नेतृत्व की नीति अक्सर तेज और अप्रत्याशित निर्णयों से प्रभावित रहती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य अचानक बदल सकता है. भारत के लिए यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि उसे अपने तीनों महत्वपूर्ण साझेदारों अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ रहा है.
इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य है. यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति मार्ग माना जाता है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है. यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री मार्ग बाधित होता है, तो इसका सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है. ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान का असर केवल ईंधन की कीमतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवहन, कृषि, उद्योग, निर्माण, प्लास्टिक, उर्वरक और उपभोक्ता वस्तुओं तक व्यापक रूप से फैल जाता है। इससे महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक गतिविधियों पर दबाव पड़ सकता है.
यही कारण है कि इस संकट के दौरान भारत को अत्यंत सावधानी से कदम उठाने पड़ रहे हैं. भारत सरकार की भूमिका एक जिम्मेदार और संतुलित राष्ट्र की है. सरकार केवल जनभावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं ले सकती, क्योंकि उसके निर्णय का प्रभाव दीर्घकालिक और बहुआयामी होता है. यदि भारत ईरान का खुलकर समर्थन करता है, तो इज़राइल के साथ उसके रक्षा संबंध प्रभावित हो सकते हैं. यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील हो सकती है, क्योंकि भारत पहले से ही क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में रक्षा सहयोग में किसी भी प्रकार की कमी रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है.
वहीं यदि भारत इज़राइल के पक्ष में खुलकर खड़ा होता है, तो ईरान के साथ संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है. इससे ऊर्जा आपूर्ति, क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं और कूटनीतिक संतुलन पर असर पड़ सकता है. इसके अतिरिक्त ईरान के साथ संबंधों में तनाव का प्रभाव होर्मुज मार्ग की सुरक्षा और भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है. इस स्थिति में भारत के लिए महंगाई, ऊर्जा संकट और आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं.
इस पूरे परिदृश्य में पाकिस्तान जैसे क्षेत्रीय कारक भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं. यदि भारत की किसी एक पक्ष के साथ निकटता बढ़ती है, तो क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं. ऐसी स्थिति में भारत को और अधिक संतुलित और सतर्क कूटनीति अपनानी होगी. पाकिस्तान यहाँ दुहरी चाल चल सकता है वह भारत से ईरान की नजदीकी का फायदा भारत और इजराइल के बीच खाई बढ़ाने में कर सकता है और अपने हमले को बढ़ा सकता है और मौके का फायदा उठाने के लिए युद्ध भी थोप सकता है. भारत का उद्देश्य किसी भी संघर्ष में पक्ष लेने के बजाय स्थिरता और संवाद को बढ़ावा देना होना चाहिए.
भारत की वर्तमान नीति इस संतुलन को बनाए रखने की दिशा में दिखाई देती है. भारत ने अब तक संयमित प्रतिक्रिया दी है और शांति तथा संवाद का समर्थन किया है. यह नीति भारत के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप है. भारत की प्राथमिकता ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा, समुद्री मार्गों की स्थिरता और क्षेत्रीय शांति सुनिश्चित करना है. इस समय भारत का ध्यान स्थिति को और अधिक जटिल बनाने के बजाय तनाव कम करने पर होना चाहिए.
इस संकट ने एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को भी उजागर किया है रणनीतिक तैयारी की. वैश्विक भूराजनीतिक घटनाएँ अचानक सामने आती हैं और उनका प्रभाव दूरगामी होता है. ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों और कूटनीतिक विकल्पों के लिए स्पष्ट रणनीतिक ढाँचा विकसित करना होगा. होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के लिए विशेष रणनीति बनाना समय की मांग है। इससे भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बेहतर तरीके से निपटा जा सकेगा.
अमेरिका ने युद्ध विराम की घोषणा करते हुए पाकिस्तान का उल्लेख किया, लेकिन पाकिस्तान की सक्रियता के कारण थे. पाकिस्तान की स्थिति भारत से अधिक फंसी हुई थी, तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थी यहां तक की उसे लिमिटेड लॉक डाउन तक लगाना पड़ा. लेकिन इससे बड़ी परेशानी उसकी ये थी की ईरान सऊदी पर लगातार हमला कर रहा था और सऊदी के साथ सुरक्षा का उसने समझौता किया था. अगर यह युद्ध सऊदी ईरान के बीच डायरेक्ट युद्ध में बदल जाता तो पाकिस्तान के सामने एक तरफ ईरान से उसके सम्बन्ध तो दूसरे तरफ सऊदी से उसका रक्षा समझौता, इसलिए पाकिस्तान ऐसी स्थिति आये ना इसके लिए प्रयासरत था. बलोचिस्तान में चल रहे संघर्ष के कारण वह ईरान से तनाव संभाल नहीं पाता ऐसे में पाकिस्तान और बलोचिस्तान दो टुकड़े होने की सम्भावना थी. पाकिस्तान अपने ही जाल में फंसता जा रहा था और इस जाल से निकलने के लिए उसके पास एक ही रास्ता था खुद आगे पहल कर युद्द को किसी तरह से रुकवाना। और वो ऐसा इसलिए कर पाया क्यों की हाल के दिनों में उसके संवाद अमेरिका से बढे हैं और ईरान से पहले ही उसके सम्बन्ध हैं. ईरान के लिए भी किसी मिडिल ईस्ट देश और भारत की जगह पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाना ज्यादा मुफीद लगा क्यूंकि पाकिस्तान के इजराइल से सम्बन्ध नहीं हैं वही भारत इजराइल हैं.
अंततः भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है. इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग, ईरान के साथ ऊर्जा संबंध और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी इन तीनों के बीच संतुलित नीति ही भारत के हित में है. भारत को किसी भी जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा.
इस जटिल परिस्थिति में भारत की संयमित और संतुलित कूटनीति ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. भारत को शांति, संवाद और स्थिरता के पक्ष में खड़े रहते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी. यही नीति भारत को इस दुविधापूर्ण स्थिति से सुरक्षित निकाल सकती है।

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